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सोयाबीन में विषाणु प्रबंधन
Sep 01, 2022
3 Min Read

सोयाबीन की फसल पूरी दुनिया में प्रोटीन और खाद्य तेल प्रदान करने वाली एक अग्रणी फसल है, इस फसल की खेती बड़े पैमाने पर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में की जाती है। सोयाबीन के पौधे से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए फसल का स्वस्थ होना महत्वपूर्ण है। सोयाबीन की फसल को प्रभावित करने के लिए विषाणु, कवक, बैक्टीरिया और गैर-संक्रामक कारको से फ़ैलने वाले १०० से अधिक रोग दुनिया भर में देखे गए है, दुनिया भर में सोयाबीन को संक्रमित करने वाले लगभग ६७ या अधिक विषाणु रोगों की सूचना मिली है, जिनमें से २७ ऐसे विशेष रोग है, जिन्हे सोयाबीन की खेती के लिए खतरा माना जाता है। हाल ही में सोयाबीन में मोज़ेक विषाणु रोग फसल में आर्थिक नुकसान का बड़ा कारण बन के सामने आया हैं।

सोयाबीन की फसल में यह सबसे प्रचलित रोग है, जो भारत और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में सबसे गंभीर, और लंबे समय से चली आ रही समस्या के रूप में जाना जाता है। एसएमवी द्वारा संक्रमण के परिणामस्वरूप आमतौर पर उपज में गंभीर हानि (८ से ५०%) और बीज की गुणवत्ता में कमी आती है।

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एसएमवी विषाणु की एक अपेक्षाकृत लम्बी आश्रित फसलों की सीमा है, जो छह कुल के पौधों के परिवारों को अधिक संक्रमित करती है, जिसमे फैबेसी, ऐमारैंथेसी, चेनोपोडियासी, पासिफ्लोरेसी, स्क्रोफुलरियासी, और सोलानेसी शामिल है। लेकिन ज्यादातर यह सोयाबीन और उसके जैसे जंगली पौधो और लेगुमिनोसी कुल के पौधो को अधिक प्रभावित करता है।

एसएमवी से संक्रमित फसल में आमतौर पर देखे जाने वाले लक्षणों में पत्तियों की शिराओ का मुड़ जाना और हल्के हरे रंग के अंतर-शिरा क्षेत्र का बना, पत्तियों का मुड़ जाना, बीजो पर धब्बे बन जाना, परिगलित क्षेत्र का बनना और कभी-कभी परिगलित क्षेत्र पर घाव बन जाना कलियों का गिर जाना इस रोग के मुख्य लक्षण है।

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पौधो में लगभग ३०% या उसे अधिक बीज बुवाई के समय ही रोग से ग्रसित हो सकते है, जो फूल आने से पहले और खेती और क्रमण के समय पर निर्भर करता है। खरपतवार और अन्य पौधे भी एसएमवी के लिए एक स्त्रोत के रूप में काम कर सकते हैं जहां विषाणु जीवित रह कर फसल को समय पर प्रभावित करते है,। फुदका जाती के कीट से भी खेतों के भीतर और बीच में रोग फैल जाता है।

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१. जन अभियान के रूप में किसानों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाए और किसनो में जागरुकता लाई जाये। २. वैकल्पिक मेजबान जैसे गर्मी में ली गई मूंग की फसल आदि पर सफेद मक्खियों की निगरानी और प्रबंधन किया जाये। ३. प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें,पीएस १०४२, पीएस १३४७, पीएस १३६८, पीएस १०९२, पीएस १२२५ , पूसा ९७ और पूसा १२ उत्तरी मैदानी क्षेत्र के लिए; मध्य क्षेत्र के लिए जेएस २०-२९ , जेएस २०-६९ , जेएस ९७-५२ और आरकेएस २४, पीएस १०२९ दक्षिणी क्षेत्र के लिए और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए जेएस ९७-५२ का उपयोग करे।

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४. फसल की बुवाई का समय सुनिश्चित करें जैसे पूर्वोत्तर और दक्षिणी क्षेत्र के लिए १५-३० जून उत्तरी मैदान और मध्य क्षेत्र के लिए २० जून से ५ जुलाई। ५. बुवाई के समय पौधो की संख्या सुनिश्चित करे जो २४-३० किग्रा/ हेक्टेयर बीज दर और ४५*५ सेमी का अंतर रखे। ६. अनुशंसित मात्रा में थियामेथोक्सम ३० एफएस @ १० मिली/ किग्रा बीज या इमिडाक्लोप्रिड ४८ एफएस @ १.२४ मिली / किग्रा के साथ बीज उपचार करें।

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७. अच्छी फसल वृद्धि के लिए उर्वरक और गोबर खाद का अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करे। ८. बुवाई के ४५ दिन बाद तक खेत को खरपतवार मुक्त रखें। ९. रोग के लक्षण वाले रोगग्रस्त पौधों को हटा दे,और नष्ट कर दे।

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१०. रस चूसने वाले कीड़ो जैसे एफिड्स को नियंत्रित करने के लिए कॉन्फिडोर जैसे अनुशंसित रसायनों का खड़ी फसल पर छिड़काव करें। ११. सोलोमन (बेटासीफ्लुथ्रिन + इमिडाक्लोप्रिड) १४० मिली/एकड़ का छिड़काव करने की भी सलाह दी जाती है। ये रसायन तना मक्खी के संक्रमण के नियंत्रण के लिए भी उपयोगी होते हैं। १२. वयस्क सफेद मक्खियों को फंसाने के लिए पीले चिपचिपे जाल (२० -२५ जाल/हे.) का प्रयोग करें।

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